तंबाकू की खेती कई तरह की मिट्टियों में की जा सकती है. हलकी दोमट, मध्यम दोमट, मिश्रित लाल व कछारी मिट्टियां इस के लिए ज्यादा मुफीद मानी जाती हैं, लेकिन ऐसी मिट्टियों में तंबाकू की पत्तियां मोटी, खुरदरी व बड़ी हो जाती हैं. ऐसे में इस फसल का इस्तेमाल हुक्का व बीड़ी बनाने के लिए किया जा सकता है. तंबाकू की खेती के लिए हलकी भुरभुरी मिट्टी ज्यादा अच्छी मानी गई है. इस में पैदा किए जाने वाले तंबाकू की गुणवत्ता व स्वाद ज्यादा अच्छा माना जाता?है, जिस का इस्तेमाल सिगार व सिगरेट वगैरह में किया जाता है.Tobacco Farming
खेती की तैयारी : तंबाकू की खेती के लिए सब से पहले नर्सरी डाली जाती है. नर्सरी के लिए हलकी भुरभुरी मिट्टी ज्यादा अच्छी होती है. नर्सरी डालने से पहले खेत की अच्छी तरह से जुताई कर के मिट्टी भुरभुरी बना लेनी चाहिए. 12 एकड़ खेत में तंबाकू की फसल रोपने के लिए 1 बीघे रकबे में नर्सरी डाली जाती है, जिस के लिए 1 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. नर्सरी में बीज डालने से पहले खेत को समतल कर के पाटा लगा देना चाहिए और सही नमी की अवस्था में रोपे जाने वाले खेत के रकबे के अनुसार नर्सरी में बीज की मात्रा डालनी चाहिए. क्षारीय मिट्टी में तंबाकू की फसल लेने से बचना चाहिए, क्योंकि इस मिट्टी में काली जड़ गलन बीमारी का प्रकोप पाया जाता है. तंबाकू की अलगअलग किस्मों के अनुसार इस की नर्सरी का समय तय किया जाता है. आमतौर पर नर्सरी डालने के लिए अगस्त के आखिरी हफ्ते से नवंबर के दूसरे हफ्ते तक का समय ज्यादा अच्छा माना जाता है. नर्सरी डालने के डेढ़ महीने बाद नर्सरी से तंबाकू के पौधों को उखाड़ कर खेत में रोपाई की जाती है. नवंबर महीने में डाली गई नर्सरी की रोपाई जनवरी के पहले हफ्ते तक की जा सकती है.
तंबाकू की प्रमुख किस्में : खाने वाले तंबाकू की खास किस्मों में पीटी 76, हरी बंडी, कोइनी, सुमित्रा, रंगपुर, ह्यइट वर्ले, भाग्य लक्ष्मी, सोना, गंडक बहार, पीएन 70, एनपी 35, प्रभात, डीजी 3 व डीजी 47 वगैरह प्रमुख मानी गई हैं. वहीं हुक्का, बीड़ी, सिगार व चुरुट के लिए एनपी 220, टाइप 23, टाइप 49, टाइप 238, पटुवा, फरुखाबाद लोकल, मोतीहारी, कलकतिया, पीएन 28, एनपीएस 219, पटियाली, सी 302 लकडा, एनपीएस 2116, चैथन, हरिसन स्पेशल, वर्जिनिया गोल्ड, जैश्री, धनादयी, कनकप्रभा, सीटीआरआई स्पेशल, जीएसएच 3, के 49, जी 6 आनंद 119, लंका 27, डीआर 1, भवानी स्पेशल व ओके 1 वगैरह उम्दा किस्में मानी गई हैं. इन किस्मों को अगस्त से नवंबर तक नर्सरी में डाला जा सकता है.
रोपाई की तैयारी : तंबाकू के पौधों की रोपाई 1 से डेढ़ महीने के भीतर खेत में कर देनी चाहिए. पौधों की रोपाई के लिए खेत में प्रति एकड़ की दर से 4 ट्राली गोबर की खाद, 50 किलोग्राम डीएपी, 25 किलोग्राम पोटाश व 10 किलोग्राम यूरिया का बुरकाव करना चाहिए. इस के बाद इस खाद को मिट्टी में मिला कर अच्छी तरह से जुताई कर के पाटा लगा देना चाहिए. नर्सरी से पौधों को उखाड़ने से 2 दिन पहले खेत की हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. इस के बाद खेत में नमी की सही मात्रा रहते ही लाइन से लाइन व पौध से पौध की दूरी ढाई फुट रख कर रोपाई करनी चाहिए. 1 एकड़ खेत में रोपाई के लिए करीब 10000 तंबाकू के पौधों की जरूरत पड़ती है. रोपाई के करने के बाद हजारे से पौधों को पानी देना चाहिए. ज्यादा रकबे की रोपाई के तुरंत बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए.What is SDO Officer ? How To Become SDO Officer एसडीओ अधिकारी क्या है, एसडीओ अधिकारी कैसे बनें
खाद व उर्वरक : रोपाई के 1 महीने बाद 80 किलोग्राम यूरिया प्रति एकड़ की दर से डेढ़ महीने के अंतर पर व दूसरी व तीसरी बार 20-20 किलोग्राम की मात्रा देनी चाहिए. तंबाकू की गुणवत्ता अच्छी हो, इस के लिए कोशिश करें कि फसल में रासायनिक खादों की जगह वर्मी कंपोस्ट, कंपोस्ट खाद व गोबर की खाद का इस्तेमाल किया जाए.
सिंचाई व खरपतवार : तंबाकू की रोपाई के बाद हर 15 दिनों पर सिंचाई करते रहना चाहिए. फसल कटाई के 15 दिनों पहले खेत की सिंचाई रोक दी जाती है. फसल की अच्छी पैदावार व गुणवत्ता के लिए पहली निराई 10-15 दिनों बाद करनी चाहिए. फसल में घासफूस के नियंत्रण के लिए जरूरत के हिसाब से 3 बार निराई करना जरूरी होता है.
बीमारियां व कीट : तंबाकू की फसल में मोजैक बीमारी का ज्यादा प्रकोप देखा गया है. इस के अलावा शुरुआती अवस्था में आग्र पतन, चित्ती, पडकुंचन रोगों का प्रकोप पाया जाता है. इस के अलावा तंबाकू की सूंड़ी, इल्ली, गिडार, तना छेदक, माहू, कटुआ व दीमक कीटों का प्रकोप देखा गया है. ये सभी कीट व रोग पौधों को पूरी तरह खत्म कर देते हैं. कीटों की रोकथाम के लिए कार्बेनिल 10 फीसदी धूल का छिड़काव फसल में कीट का प्रकोप दिखाने के समय ही कर देना चाहिए. इस के अलावा क्लोर पायरीफास 20 ईसी या प्रोफेनोफास 50 ईसी का छिड़काव करना चाहिए. बीमारी की रोकथाम के लिए कार्बेंडाजिम, मैंकोजेब, थीरम, मेटालेक्जिल, डीनोकेप दवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए. तंबाकू की फसल के लिए ज्यादा पाला व ज्यादा बारिश भी नुकसानदेह होती है. ज्यादा पाले व बारिश की दशा में फसल के सूखने व बरबाद होने के आसार बढ़ जाते हैं. ऐसे में ज्यादा बारिश व पाले वाली जगहों पर तंबाकू की खेती करने से बचना चाहिए.Small business ideas Regular Income कैसे बनाएँ business develop kaise kare
फुनगों की तोड़ाई : तंबाकू की फसल में अच्छी गुणवत्ता व पैदावार बढ़ाने के लिए उस के फुनगों की तोड़ाई करना जरूरी होता है. जब फसल 60 दिनों की हो जाए, तो हर 10 दिनों के बाद 3 बार फुनगों की तोड़ाई की जानी चाहिए. यह कोशिश करें कि पौधों में 9 से 10 पत्ते ही आने पाएं.
पौधों की कटाई : खाने वाले तंबाकू की फसल 120 दिनों में, बीड़ी वाले तंबाकू की फसल 140 से 150 दिनों में और सिगार व चुरुट वाले तंबाकू की फसल 90 से 100 दिनों में कटाई के लायक हो जाती है. पौधों की पत्तियां जब हरी हों तभी उन की कटाई कर देनी चाहिए और कटाई के बाद 3 दिनों तक पौधों को खेत में ही छोड़ देना चाहिए. जब पत्तियां पीली पड़ जाएं तो उन को खेत से उठा कर सही जगह पर दोबारा फैला कर सूखने के लिए छोड़ देना चाहिए. इस दौरान खाने वाले तंबाकू की नसों पर चीरा लगाना जरूरी होता है. सूखने के दौरान तंबाकू में नमी व सफेदी जितनी ज्यादा आती है उतना ही अच्छा गुण, रंग, स्वाद व गंध पैदा होती है. ऐसे में तंबाकू की पलटाई समय से करते रहना चाहिए. इस से किसानों को तंबाकू का अच्छा मूल्य मिल जाता?है. घर पर करीब 1 हफ्ते तक सुखाने के बाद पत्तियों में चीरा लगा कर अलगअलग किया जाता है. उस के बाद कुछ दिनों के लिए पत्तियों को पालीथीन से ढक कर सुगंध पैदा करने के लिए छोड़ दिया जाता?है. जब उन मेंअच्छी सुगंध उठने लगती है, तो इस की गठिया बांध कर इस में पानी का छिड़काव कर के छटका जाता है. जब इस में सफेदी आने लगे तो यह मान लिया जाता है कि तंबाकू की गुणवत्ता अच्छी स्थिति में हो गई है.Honey Processing Business How to Make it in Hindi शहद प्रसंस्करण व्यवसाय इसे कैसे बनाएं
मार्केटिंग व लाभ : तंबाकू किसान ओमप्रकाश का कहना है कि ज्यादातर मामलों में खेत में खड़ी फसल ही बिक जाती है, जिसे व्यापारी करीब 25000 रुपए प्रति बीघे की दर से लेते हैं. तंबाकू की 1 एकड़ फसल के लिए करीब 15000 रुपए की लागत आती है, जबकि 1 एकड़ से फसल अच्छी होने की दशा में 4 महीने में करीब 1 लाख रुपए की आमदनी होती है. इस प्रकार लागत मूल्य को निकालने के बाद शुद्ध आमदनी करीब 85 हजार रुपए प्रति एकड़ हो जाती है. भारतीय तंबाकू की ज्यादा मांग बाहरी देशों में होने के कारण अच्छा मूल्य मिलता है. भारत द्वारा उत्पादित तंबाकू अमेरिका, रूस, फ्रांस, अफ्रीका, ब्रिटेन, सिंगापुर, बेल्जियम, हांगकांग, चीन, नीदरलैंड व जापान वगैरह देशों को भेजा जाता है. ऐसे में किसान विदेशी निर्यातक व्यापारियों से संपर्क कर के अपनी उपज का अच्छा दाम पा सकते हैं.Derma Roller Therapy Acne Scars Glowing Skin & Hair loss Use derma roller in Hindi चिकित्सा मुँहासे निशान काले धब्बे चमक त्वचा के बालों का झड़ना रोकने के उपयोग
तंबाकू की खेती से किसान हुआ मालामाल
बस्ती जिले के परशुरामपुर ब्लाक की पश्चिमी सीमा पर स्थित गांव मदनापुर के रामराज वर्मा के परिवार में कुल 25 लोग हैं. 40 साल पहले उन के पास केवल 12 बीघे जमीन थी, जिस पर वे पारंपरिक रूप से धान व गेहूं की फसल ले रहे थे. लेकिन उन्हें इस खेती से कोई खास फायदा नहीं मिल रहा था. ऐसे में वे अपने आसपास के किसानों से व्यावसायिक खेती के बारे में पता करते रहते हैं. एक बार वे किसी काम से गोंडा जिले के नवाबगंज ब्लाक में गए थे. उन्होंने वहां किसानों को तंबाकू की खेती करते देखा. जब उन्होंने वहां के किसानों से तंबाकू की खेती के बारे में जानकारी ली, तब उन्हें पता चला कि तंबाकू की खेती से कम समय में अच्छा फायदा मिल सकता है. ऐसे में घर आ कर उन्होंने परिवार के लोगों से तंबाकू की खेती किए जाने पर बातचीत की. सभी लोगों की रजामंदी के बाद उन्होंने अपने 2 एकड़ खेत में तंबाकू की खेती की शुरुआत की. पहली बार उन्हें कोई खास फायदा नहीं हुआ, लेकिन तंबाकू की तैयार फसल बेचने में किसी तरह की परेशानी नहीं आई.
तंबाकू बाजार ने बढ़ाया जोश : किसान रामराज वर्मा ने तंबाकू की बिक्री को देखते हुए इस की व्यावसायिक व वैज्ञानिक खेती का फैसला ले दिया था. तंबाकू की फसल से उन्हें 2 एकड़ खेत से साल 1974 में करीब 5000 रुपए की आमदनी हुई. उन्होंने तंबाकू की खेती से हुई आमदनी के पैसे से 15 एकड़ खेत लीज पर ले कर तंबाकू की खेती की. इस बार उन्हें करीब 25000 रुपए की आमदनी हुई. वे तंबाकू की गुणवत्ता का विशेष खयाल रखते थे, जिस से तंबाकू व्यापारी उन के घर से तैयार फसल को खरीद कर ले जाते थे. किसान रामराज के परिवार के 25 लोग लगातार तंबाकू की खेती में लगे रहे और करीब 5 सालों में वे किराए की 25 एकड़ जमीन पर तंबाकू की खेती करने लगे थे.
3 एकड़ खेत से 50 एकड़ खेत के बने मलिक
यह किसान रामराज वर्मा की मेहनत का ही फल था कि उन्हें लगातार तंबाकू की खेती से फायदा मिलता रहा. ऐसे में उन्होंने तंबाकू की खेती से कुछ ही सालों में अच्छा फायदा लेना शुरू कर दिया था. फायदे के इस पैसे का इस्तेमाल उन्होंने परिवार के सदस्यों की संख्या को देखते हुए जमीन की खरीदारी में किया और वे हर साल तंबाकू की फसल से होने वाले फायदे के पैसे से कुछ न कुछ जमीन खरीदते रहे. अपनी मेहनत की वजह से वे करीब 40 सालों में 200 बीघे खेत के मालिक बन गए. 2 एकड़ खेत में शुरू की गई तंबाकू की खेती वर्तमान में 15 एकड़ तक पहुंच गई है, जिस से वे अच्छी आमदनी ले रहे हैं.
इस के अलावा उन्होंने खेती व उस से जुड़े रोजगारों में भी परिवार के सदस्यों को जोड़ लिया. तंबाकू की खेती के अलावा वे बागबानी फसलों की तरफ भी मुड़े. आजकल वे 25 बीघे खेत में टिश्यूकल्चर विधि से तैयार की गई केले की जी 9 व रोबेस्टा प्रजाति की खेती कर रहे हैं. केले की खेती से अच्छा फायदा लेने के लिए उन्होंने परिवार के सदस्य ओमप्रकाश को जिम्मेदारी सौंप रखी है. ओमप्रकाश तैयार केले की फसल को नजदीकी मंडी में ले जाते हैं, जिस से बिचौलियों की वजह से नुकसान नहीं होने पाता है.
जैविक खेती के लिए पशुपालन
किसान रामराज वर्मा ने अपने खेतों में बोए गए तंबाकू व बागबानी फसलों में कैमिकलयुक्त खादों व उर्वरकोें के इस्तेमाल में कमी लाने के लिए 16 दुधारू पशुओं को पाल रखा है, जिन से प्राप्त होने वाले मलमूत्र का इस्तेमाल वे गोबर गैस प्लांट में करते हैं और गोबर गैस से प्राप्त अवशिष्ट का प्रयोग जैविक खाद के रूप में करते हैं. किसान रामराज वर्मा ने यह साबित कर दिया है कि अगर व्यावसायिक फसलों की खेती उन्नत तरीके से की जाए तो न केवल वह किसान के लिए फायदेमंद बन सकती है, बल्कि उस से दूसरे लोगों को भी जोड़ा जा सकता है. उन की तंबाकू की खेती से होने वाले लाभ को देखते हुए गांव के तमाम लोगों ने तंबाकू की खेती को अपना कर अपनी माली हालत को मजबूत किया है.
किसान रामराज वर्मा से तंबाकू की खेती के गुर सीखने के लिए दूसरे जिलों के लोग भीउन के खेतों तक चल कर आते हैं. दूसरे जिलों से आए किसानों को रामराज वर्मा न केवल तंबाकू की खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारी देते हैं, बल्कि उस की प्रोसेसिंग, गुणवत्ता निर्धारण व मार्केटिंग के बारे में भी बताते हैं.
तंबाकू की रोपाई का आदर्श समय 20 सितंबर से 10 अक्टूबर माना गया है। 6-8 सप्ताह के स्वस्थ बीचडे़ की रोपाई करनी चाहिए। इसके लिए किसानों को तंबाकू की पौधशाला में स्वस्थ बीचडे़ उत्पादन के लिए रैबिंग विधि अपनाना चाहिए। इसमें सूखे खर-पतवार, पत्तिया या पुआल की 15-20 सेमी मोटी परत मिट्टी के उपर बिछाकर उसे जलाया जाता है। फलस्वरूप खर पतवार के बीज एवं मिट्टी में उपस्थित रोग एवं कीडे़ नष्ट हो जाते हैं। बीज गिराने से पूर्व क्यारी में तोड़ी की खल्ली, सिंगल सुपर फास्फेट तथा 10 ग्राम फ्यूराडान दबा अच्छी तरह मिला दे। अच्छे अंकुरण के लिए बुआई के समय क्यारी में नमी का होना भी आवश्यक है। तेज धूप और तेज वर्षा से बीचडे़ को बचाने के लिए टाटी से ढंक दें। अंकुरण बाद उसे हटा लें। क्यारी से घने पौधे हटाए एवं नमी बनाये रखे। छह से आठ सप्ताह के बीज की रोपाई करें। अगस्त के अंतिम सप्ताह में बीचडे़ अवश्य गिरा लें।
खेती की तैयारी
तम्बाकू के बीचड़े की रोपाई से पूर्व खेत को अच्छी तरह जुताई करें, ताकि उसमें ढेले न रहे। खेत में पाटा चला कर समतल कर दें। दस टन प्रति एकड़ कम्पोष्ट या गोबर, खल्ली 1112 किलो, रोपनी पूर्व यूरिया 80 किलो, कैल्सियम 86 किलो, फॉस्फेट 150 किलो, पोटाश 45 किलो प्रति एकड़ जोत में मिला दें।
ये प्रभेद हैं फायदेमंद
आरएयू के तकनीकी सहायक उदय कुमार के अनुसार तम्बाकू की उपज एवं गुणवत्ता के ख्याल से पीटी 76 प्रभेद के लिए 1 मीटर गुणा 90 सेमी तथा वैशाली स्पेशल, सोना, विच्छवी एवं अन्य प्रभेद के लिए 90 सेमी गुणा 75 सेमी की दूरी एवं विनियास उत्तम होता है। अच्छी आमदनी हेतु पीटी 76, वैशाली स्पेशल और लिच्छवि प्रभेदों में अन्य प्रभेदों के अपेक्षा ज्यादा निकोटिन पाया जाता है। जिससे बाजार में अच्छा मूल्य किसानों को मिलता है।
तम्बाकू पौधे की पत्तियों से प्राप्त होता है। यह एक मादक और उत्तेजक पदार्थ है, जो ‘निकोशियाना” (अंग्रेज़ी नाम : Nicotiana) जाति के पौधे की बारीक कटी हुई पत्तियों, जो कि खाने-पीने तथा सूँघने के काम आती हैं, से प्राप्त किया जाता है। किसी अन्य मादक या उत्तेजक पदार्थ की अपेक्षा तम्बाकू का प्रयोग आज सबसे अधिक मात्रा में किया जा रहा है। भारत में तम्बाकू का पौधा पुर्तग़ालियों द्वारा सन 1608 ई. में लाया गया था और तब से इसकी खेती का क्षेत्र भारत के लगभग सभी भागों में फैल गया है। भारत विश्व के उत्पादन का लगभग 7.8 प्रतिशत तम्बाकू उत्पन्न करता है।
उत्पत्ति तथा इतिहास
तम्बाकू की उत्पत्ति कब और कहाँ हुई, इसका ठीक पता नहीं चलता। कहते हैं कि, एक बार पुर्तग़ाल स्थित फ्राँसीसी राजदूत ‘जॉन निकोट’ ने अपनी रानी के पास तम्बाकू का बीज भेजा और तभी से इस पौधे का प्रवेश प्राचीन संसार में हुआ। निकोट के नाम को अमर रखने के लिये तम्बाकू का वानस्पतिक नाम ‘निकोशियाना’ रखा गया। तम्बाकू दक्षिणी अमेरिका का पौधा माना जाता है। इसकी खेती ऐतिहासि काल से हाती चली आ रही है। यद्यपि तम्बाकू अयनवृत्तीय पौधा है, तथापि इसकी सफल खेती अन्य स्थानों में भी होती है, क्योंकि यह अपने को विभिन्न प्रकार की भूमि तथा जलवायु के अनुकूल बना लेता है।
विभिन्न जातियाँ
अब तक संसार में तम्बाकू की 60 विभिन्न जातियाँ मिल चुकी हैं। इनमें से ‘निकोशियाना टबैकम’ और ‘निकोशियाना रस्टिका’ की खेती बड़े पैमाने पर होती है। खेती तथा व्यापार की दृष्टि से केवल ये ही दो जातियाँ उपयोगी सिद्ध हुई हैं।
भारत में तम्बाकू का आगमन
ऐसा माना जाता है कि, 17वीं सदी में पुर्तग़ालियों द्वारा भारत में तम्बाकू की खेती का प्रारंभ हुआ। 17वीं, 18वीं सदियों में यूरोपीय यात्रियों ने भारत में तम्बाकू की खेती और उसके उपयोग का उल्लेख किया है। मुग़ल सम्राट जहाँगीर के समय में तम्बाकू की खेती का प्रचार नहीं हो पाया, क्योंकि उन्होंने घोषणा की थी, कि तम्बाकू पीनेवालों के होठों को काट दिया जाएगा। व्हाइटलॉ आइन्स्ली की लिखी हुई ‘मेटिरिया इंडिका’ नामक पुस्तक में देशी तथा यूरोपीय डॉक्टरों द्वारा भारत में दवा संबंधी प्रयोजनों के लिये तम्बाकू के उपयोग के बारे में लिखा है। सामाजिक रुकावटों के अभाव के कारण अब धूम्रपान सरलता से अपनाई जानेवाली आदत बन गई है।
राजस्व प्राप्ति का साधन
आज विश्वभर में अमेरीका तथा चीन के बाद बड़े पैमाने पर तम्बाकू पैदा करने वाला तीसरा राष्ट्र भारत है। आज भारत तथा विश्व में अन्य राष्ट्रों की सरकारों के लिये तम्बाकू कर के रूप में कामधेनु के समान है। कृषक के लिये तम्बाकू बहुत ही मुख्य नक़द शस्य (फ़सल) है। प्रतिवर्ष अनुमानत: 45 करोड़ रुपए तम्बाकू की खेती से उत्पादकों को मिलते हैं। इसके अतिरिक्त केंद्रीय सरकार को 45 करोड़ रुपये तम्बाकू उत्पादन शुल्क, अनुमानत: दो करोड़ निर्यातकर और देश को 16 करोड़ की मूल्य का विदेशी विनिमय मिलता है।
तम्बाकू
तम्बाकू की खेती करने वाले निर्माता, निर्यातक तथा अनगिनत मध्यवर्ती लोग इससे खूब लाभ उठा रहे हैं। इसके अतिरिक्त तम्बाकू के विभिन्न उद्योगों में लाखों व्यक्ति जीविका पा रहे हैं। भारत तम्बाकू में स्वयं समृद्ध है और अपनी पैदावार का 16-17 प्रतिशत दुनिया के विभिन्न भागों को निर्यात करता है।
भारत में तम्बाकू की पैदावार
सब फ़सलों का केवल 0.28 प्रतिशत भाग ही भारत में तम्बाकू की खेती होती है। सन् 1959 में तम्बाकू की खेती का क्षेत्र 8,96,000 एकड़ था। इसमें अनुमानत: 5,89,00,000 पाउंड तम्बाकू पैदा हुआ। भारत में आंध्र प्रदेश तम्बाकू उत्पादन का प्रधान केन्द्र है। यहाँ तम्बाकू उत्पादन का 66 प्रतिशत तथा देश के वर्जीनिया सिगरेट तम्बाकू का 95 प्रतिशत पैदा होता है। तम्बाकू पैदा करने वाले अन्य क्षेत्र हैं: महाराष्ट्र, गुजरात, मद्रास, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, हैदराबाद, मैसूर, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा पंजाब।
भौगोलिक दशाएँ
तम्बाकू की खेती के समय निम्नलिखित भौगोलिक दशाओं की आवश्यकता रहती है-
- तापमान – तम्बाकू की पैदावार का क्षेत्र बड़ा विस्तृत है। इसका उत्पादन समुद्र के धरातल से लेकर 1800 मीटर की ऊंचाई तक भी किया जा सकता है। इसके पूर्ण विकास के लिए तापमान18° से 40° सेल्सियस के मध्य ठीक रहता है। पाला तम्बाकू के लिए घातक है। अतः इसकी खेती वहीं की जाती है, जहाँ पाले का 200 दिन तक भय नहीं रहता, जैसे- पश्चिम बंगाल, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र एवं अन्य दक्षिणी राज्यों में।
- वर्षा – इसके लिए साधारणतः 50 से 100 सेटीमीटर वर्षा ही चाहिए। इससे अधिक वर्षा वाले भागों में इसकी खेती नहीं की जा सकती। पत्तियों के पकने के समय वर्षा हो जाने से इसकी किस्म बिगड़ जाती है। पकने के समय स्वच्छ आकाश और तेज धूप का होना आवश्यक है। इसकी जड़ों में जल एकत्रित नहीं होना चाहिए, अतः तम्बाकू की कृषि नदियों की ढालू घाटियों और पठारी भागों पर अधिक की जाती है।
- मिट्टी – तम्बाकू के लिए गहरी दोमट अथवा मिश्रित लाल व कछारी मिट्टी उपयुक्त रहती है। तम्बाकू भूमि में से उपजाऊ तत्वों को बहुत जल्दी खींच लेती है, अतः पोटाश, फ़ॉस्फ़ोरिक ऐसिड और लोहांश के रूप में खाद की आवश्यकता पड़ती है। अधिकतर हरी या रासायनिक खाद (अमोनियम सल्फेअ व फ़ॉस्फेट) दी जाती है।
- श्रम – तम्बाकू के पौधे लगाने, काटने, पत्तियों के सुखाने और तेयार करने में सस्ते श्रमिकों की आवश्यकता पड़ती है।
तम्बाकू की किस्में
तम्बाकू शीतकाल में पैदा होती है। जहाँ सिंचाई की सुविधाएँ प्राप्त हैं, वहाँ दो फ़सलें भी प्राप्त की जाती हैं। पहली फ़सल जनवरी से जून तक तथा दूसरी अक्टूबर से मार्च तक। तम्बाकू की किस्म मिट्टी, अपने रंग, वज़न और खाद पर निर्भर करती है। मौसम में हल्के परिवर्तन एवं पत्तियों की छंटनी और सफाई और तैयार करने की विशेष विधि का भी किस्म पर प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः कहा जा सकता है कि ठण्डी नम, ग्रीष्म ऋतु और हल्की नरम भूमि होने पर पत्तियाँ अच्छे रेशे वाली और मधुर स्वाद वाली होती हैं, किन्तु जब भूमि कठोर और तापमान ऊँचा रहता है तो पत्तियाँ मोटी और तेज स्वाद वाली होती है।
भारत में लगभग 60 किस्म की तम्बाकू बोयी जाती है, किन्तु इनमें दो ही मुख्य हैं- ‘निकोटिना टुवैकम’ और ‘निकोटिना रस्टिका’। भारत में सबसे अधिक क्षेत्रफल प्रथम किस्म के अन्तर्गत है। टुवैकम सारे भारत में बोयी जाती है। इसमें गुलाबी रंग के के फूल होते हैं। इसका पौधा लम्बा और पत्तियाँ बड़ी होती हैं। सिगरेट, चुरुट, बीड़ी, हुक्का तथा खाने और सूंधनी बनाने में इसका प्रयोग किया जाता है। बिहार का उत्तरी मैदान एवं कृष्णा-गोदावरी डेल्टा की जलवायु उष्णार्द्र होने के कारण ये क्षेत्र तम्बाकू उत्पादन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। चूंकि रस्टिका तम्बाकू को ठण्डी जलवायु की आवश्यकता होती है, अतः यह मुख्यतः उत्तरी और उत्तर-पूर्वी भारत में पैदा की जाती है, इसका पौधा छोटा, पत्तियाँ रूखी और भारी होती हैं। रंग काला और महक तेज होती है। इसका उपयोग हुक्का, खाने और सूंघनी बनाने में होता है।
भारत में प्रतिवर्ष लगभग 3 लाख से 3.5 लाख हेक्टेअर क्षेत्र पर तम्बाकू की कृषि होती है। देश का लगभग 85 प्रतिशत तम्बाकू का उत्पादन क्षेत्र मात्र चार राज्यों आन्ध्र प्रदेश (36 प्रतिशत), कर्नाटक(24 प्रतिशत), गुजरात (21 प्रतिशत) तथा बिहार (4 प्रतिशत) में है। तम्बाकू उत्पादन की दृष्टि से आन्ध्र प्रदेश का स्थान प्रथम, गुजरात का द्वितीय तथा कर्नाटक का तृतीय स्थान है। तम्बाकू उत्पादन का शेष क्षेत्र तमिलनाडु, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश राज्यों में है।
आन्ध्र प्रदेश के गुंटूर, कृष्णा, पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी ज़िले तथा तेलंगाना क्षेत्र में तम्बाकू अधिक पैदा की जाती है, किन्तु दो तिहाई से भी अधिक क्षेत्र गुंटूर ज़िले में है। इस क्षेत्र की मिट्टी काले रंग की है, जिसमें चूने की मात्रा कम है। इसमें जल धारण करने की क्षमता अधिक होती है। पत्तियों की तैयारी के समय पर्याप्त आर्द्रता रहती है, जिससे पत्तियाँ सुन्दर और उत्तम किस्म की होती हैं। गरम जलवायु व नम मिट्टी तथा सूर्य की धूप मिलने से यहाँ विभिन्न प्रकार की वर्जीनिया तम्बाकू तथा नाटू, थोक आकू आदि उगायी जाती हैं। मुख्यतः चुरुट और सिगार बनाने क काम में लायी जाती है।
उत्तरी बिहार में बिहार के समस्तीपुर, दरभंगा, मुंगेर और पूर्णिया ज़िले तथा पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी, माल्दा, हुगली, कूचबिहार और बहरामपुर ज़िले सम्मिलित हैं। गंगा के ढालू मैदान की उपजाऊ मिट्टी इसकी कृषि के लिए आदर्श है। यहाँ हुक्के के लिए उपयोगी एन टुबैकम, एन रस्टिका की विविध किस्में (विलायती, मोतीहारी और जट्टी) पैदा की जाती हैं। खाने और सूंघने की तम्बाकू भी यहाँ पैदा की जाती है।
गुजरात राज्य के खेड़ा ज़िले में आनन्द, घोरसद, पेटलाद और नाडियाड ताल्लुके चरोत्तर क्षेत्र सम्मिलित हैं। इस प्रदेश में तम्बाकू की विभिन्न किस्में (निकोटिना रस्टिका और वर्जीनिया टुबकैम) बोयी जाती है। यहाँ की तम्बाकू बीड़ी के लिए अधिक उपयुक्त होती है।
महाराष्ट्र के कोल्हापुर, सांगली, मिराज और सतारा ज़िले में निपानी क्षेत्र में मुख्यतः बीड़ी की तम्बाकू उगायी जाती है। यहाँ गहरी काली और गहरे लाल रंग की मिट्टी में तम्बाकू पैदा की जाती है। कर्नाटक के वेलगावी ज़िले में उत्तम तम्बाकू पैदा की जाती है।
उत्तर प्रदेश के वाराणसी, मेरठ, बुलन्दशहर, मैनपुरी, सहारनपुर, कन्नौज और फ़र्रुख़ाबाद ज़िले; पंजाब के अमृतसर, जालन्धर, गुरुदासपुर तथा फ़िरोजपुर ज़िले और हरियाणा के गुड़गांव, करनालऔर अम्बाला ज़िले तम्बाकू के मुख्य उत्पादक शहर हैं। यहाँ हुक्का के लिए तथा खाने के लिए बढि़या किस्म की कलकतिया तम्बाकू उगायी जाती है।
तमिलनाडु राज्य के मदुरै, कोयम्बटूर, तंजावुर, डिंडीगुल, तिरुचिरापल्ली, ज़िलों में इसकी कृषि होती है। इसमें सिगार और चुरुट में भरी जाने वाली तथा खाने और सूंघने की तम्बाकू उगायी जाती है।
व्यापार
देश में तम्बाकू की औसत उत्पादकता 1500 से 1600 किलोग्राम प्रति हेक्टेअर है। उत्पादन का अधिकांश देश में खप जाता है। निर्यात के लिए अधिक मात्रा नहीं बच पाती। फिर भी यहाँ से बिना तैयार की हुई तम्बाकू का निर्यात किया जाता है। यह निर्यात संयुक्त राज्य अमरीका, रूस, अदन, बेल्जियम, श्रीलंका, बांग्लादेश, चीन, नीदरलैण्ड्स, फ़्राँस, दक्षिण अफ़्रीका, ब्रिटेन, मिस्र, सिंगापुर, जापान और हांगकांग को किया जाता है। निर्यात कोलकाता, चेन्नई और मुम्बई बन्दरगाहों द्वारा होता है। उच्च कोटि की सिगरेटों में मिश्रण के लिए संयुक्त राज्य अमरीका में गरम वायु में सुखायी गयी तम्बाकू आयात की जाती है। कुछ तम्बाकू मिस्र, पाकिस्तान और म्यांमार से भी आयात होती है।
विभिन्न उपयोग
एन. रस्टिका जाति के तम्बाकू का अधिकांश भाग हुक्के में पीने के लिये प्रयुक्त होता है। एन. टवैकम जाति का तम्बाकू सिगरेट, बीड़ी, सुँधनी और खानेवाले तम्बाकू के काम में आता है। वर्जीनिया तम्बाकू, जो अधिकतर आंध्र प्रदेश राज्य में उगाया जाता है और सिगरेट बनाने के काम में प्रयुक्त होता है, व्यापार की दृष्टि से प्रधान है। बर्ली तम्बाकू का सिगरेटों में संमिश्रण के लिये अधिकतर उपयोग किया जाता है। नाटू (देशी) तम्बाकू, जो की ‘चुट्ट’ नाम से प्रसिद्ध है, छोटे और हाथ से लपेटे जाने वाले चुरुट बनाने के काम आता है। इस तम्बाकू की हल्की तथा भूरे रंग की पत्तियों का सस्ती सिगरेटों के निर्माण में उपयोग किया जाता है। गहरे भूरे रंग की पत्तियाँ, पाइप में पीने के तम्बाकू की विभिन्न किस्में तैयार करने के लिये ‘यूनाइटेड किंगडम’ को निर्यात की जाती हैं। दक्षिण मद्रास के दिंडुकल, तिरुचिरापल्ली और कोयंवटूर ज़िलों में उगाया गया प्रमुख जाति का तम्बाकू चुरुट और सिगार बनाने में तथा खानेवाला तम्बाकू तैयार करन में काम आता है।
तम्बाकू के विभिन्न नाम
यद्यपि तम्बाकू नाम से एक ही फ़सल का आभास होता है, तथापि विभिन्न उपयागों में आने वाले तम्बाकूओं की खेती तथा सिझाई में इतना अंतर है कि, उनके भिन्न-भिन्न नाम रख दिए गए हैं, जैसे- ‘हुक़्क़ा तम्बाकू’, गरम हवा से सिझाया गया ‘सिगरेट तम्बाकू’, धूप में सुखाया गया ‘सिगरेट तम्बाकू’ इत्यादि।
पौधशाला तैयार करना
तम्बाकू रोपित फ़सल है, जिसकी सफलता उसकी पौधशाला पर निर्भर है। यदि सुदृढ़ स्वस्थ और एक ही अवस्था के पौधे नहीं लगाए जाएँगे, तो फ़सल अच्छी नहीं होती है। पौधशाला की भूमि का चुनाव करते समय यह बात ध्यान में रखनी चाहए कि, स्थान ऊँचाई पर हो, पानी का निकास अच्छा हो तथा सिंचाई का साधन निकट हो। हर साल एक ही भूमि पर पौधशाला नहीं लेनी चाहिए। भूमि पर 4 फुट चौड़ी पटरियों पर पौधशाला उगानी चाहिए। पटरियों के बीच 1.1/2 फुट चौड़ा रास्ता आने जाने, पानी निकालने और काम करने के लिये छोड़ना चाहिए। आवश्यकतानुसार बीज को लेकर बालू या राख में मिलाकर बोने के बाद हथेली से पीओ देना चाहिए तथा पानी देते रहना चाहिए। एन. टबैकम का आधा सेर से एक सेर तक तथा एन. रस्टिका का दो से तीन सेर तक बीज एक एकड़ पौधशाला के लिये पर्याप्त होता है।
पौध-रोपण
जब पौधे 4-6 इंच बड़े हो जाते हैं, तो उनको अच्छी तरह तैयार किए हुए खेतों में लगा देते हैं। तम्बाकू की एन. टबैकम जाति के पौधों को सामान्यत: 2.1/2 से 3 फुट की दूरी पर तथा एन. रस्टिका के पौधों को 1.1/2 फुट की दूरी पर लगाते हैं। ये दूरियाँ कतार से कतार तथा पेड़ से पेड़ के बीच रखी जाती हैं। रोपाई शाम को करनी चाहिए। कहीं-कहीं नम खेत में रोपाई की जाती है और कहीं-कहीं रोपाई के बाद तुरंत पानी देते हैं।
ध्यान रखने योग्य तथ्य
तम्बाकू की फ़सल के सम्बन्ध में निम्नलिखित तथ्य मुख्य रूप से स्मरण रखने चाहिए –
- आवश्यकतानुसार सिंचाई, निराई और गुड़ाई करते रहना चाहिए।
- तम्बाकू के फूलों को तोड़ना अति आवश्यक है, नहीं तो पत्ते हलके पड़ जाएँगे और फलस्वरूप उपज कम हो जाएगी तथा पत्तियों के गुणों में भी कमी आ जाएगी।
- फूल तोड़ने के बाद पत्तियों के बीच की सहायक कलियों से पत्तियाँ निकलने लगती हैं, उनको भी समयानुसार तोड़ते रहना चाहिए।
- बीज के लिये छोड़े जाने वाले पौधों के फूलों को नहीं तोड़ना चाहिए।
पत्तियों को सिझाना
पके हुए पेड़ों को जड़ से काटकर या पकी पत्तियों को तोड़कर सिझाते हैं। सिझाने के तरीकों में विशेष अंतर है। सिझाई उस क्रिया का नाम है, जिसके द्वारा पत्तियाँ सुखाकर बेचने योग्य बनाई जाती हैं। इस क्रिया में बहुत से रासायनिक परिवर्तन होते हैं और नमी की मात्रा घटकर 12-14 प्रतिशत रह जाती है। अधिक नम तम्बाकू रखने से वह सड़ जाती है। सिझाई हुई तम्बाकू को ही खाने, पीने या सूँधने के काम में लाते हैं। हुक़्क़ा तम्बाकू का डंठल भी पीने के काम आता है। तम्बाकू की बीमारियों तथा कीड़ो का भी समुचित निरोध करते रहना चाहिए, नहीं तो फ़सल को हानि पहुँच सकती है।
तम्बाकू का तैयार माल
भारत में तम्बाकू के तैयार माल सिगरेट, सिगार, बीड़ी, सुँघनी, चबाया जाने वाला (खैनी) तम्बाकू और हुक़्क़ा तम्बाकू हैं। तम्बाकू के बीज से तेल भी निकलता है। इस तेल का वार्निश और रंग के उद्योग में लाभदायक रूप से उपयोग किया जा सकता है। इसकी खली का पशुओं को खिलाने या खेतों के लिए खाद के रूप में भी उपयोग हो सकता है।
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निर्धारित उत्पादन नीति पर आधारित है, उत्पादकों और दूसरों के नियम के अनुसार वर्जीनिया तम्बाकू के उत्पादकों, नर्सरी कार्य से जुडे के पंजीकरण के पंजीकरण या नवीनीकरण के लिए मापदंड नीचे रखना होगा के लिए पंजीकरण समिति 33 (2) और 33-डी (1) के तंबाकू बोर्ड के नियमों 1976 समिति ने भी नियम के अनुसार लाइसेंस या बर्न्स् के निर्माण और बर्न्स् के संचालन के लिए लाइसेंस के नवीकरण के अनुदान के लिए मापदंड नीचे देता 34-एम (1) और 34-ओ (1) तम्बाकू बोर्ड नियम 1976 की। पंजीकरण समिति क्षेत्र निर्धारित लक्ष्यों वार क्षेत्र पर ध्यान में लाइसेंस प्राप्त बर्न्स् और तम्बाकू आधारित के उत्पादकता के स्तर की संख्या ले अधिकृत होने के लिए खलिहान और कोटा प्रति पंजीकृत होने के लिए पर फैसला किया। तदनुसार पंजीकृत उत्पादकों ने अपने खलिहान (एस) और उसकी / उसके लाइसेंस प्राप्त खलिहान (एस) के लिए खेती की जा करने के लिए क्षेत्र की हेक्टेयर की संख्या के लिए निश्चित किलोग्राम के मामले में एक उत्पादन कोटा आवंटित कर रहे हैं और उसी के साथ पालन करने के लिए बारीकी से निगरानी कर रहे हैं। वाणिज्यिक नर्सरी उत्पादकों के पंजीकरण के पंजीकरण / नवीनीकरण के लिए मानदंड (नियम 33-सी, डी):
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